
देवाल, चमोली। उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान कही जाने वाली विश्व प्रसिद्ध श्रीनंदा देवी राजजात यात्रा को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। वर्ष 2026 में अगस्त-सितंबर के दौरान प्रस्तावित इस ऐतिहासिक हिमालयी महाकुंभ को लेकर कोर कमेटी की बैठक में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। अब यात्रा का आगामी कार्यक्रम और औपचारिक घोषणा अगले वर्ष वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर की जाएगी। यह फैसला चमोली जिला प्रशासन की रिपोर्ट और हाल के वर्षों में आए प्राकृतिक बदलावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
आखिर क्यों टालनी पड़ी ‘हिमालयी महाकुंभ’ की तारीख?
राजजात यात्रा को स्थगित करने के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा और प्रतिकूल मौसम बताया जा रहा है। कोर कमेटी के अध्यक्ष राकेश कुंवर की अध्यक्षता में कर्णप्रयाग में आयोजित बैठक में कई गंभीर पहलुओं पर चर्चा हुई। प्रशासन द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में जनपद के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर देवाल, थराली और नंदनगर (घाट) में भारी बारिश और बादल फटने जैसी आपदाओं ने बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचाया है।
अध्ययन दल की रिपोर्ट कहती है कि यात्रा मार्ग के कई पड़ावों पर अभी भी सुरक्षा और सुविधाओं के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाए हैं। इसके अतिरिक्त, मई-जून के दौरान ‘मलमास’ (अशुभ समय) होने के कारण होमकुंड में पूजा की तिथि 20 सितंबर के आसपास पड़ रही है। सितंबर के अंत में बुग्याली क्षेत्रों और हिमालय की ऊंचाइयों पर मौसम बेहद अनिश्चित हो जाता है। वहां न केवल कड़ाके की ठंड और बर्फबारी का खतरा रहता है, बल्कि ऑक्सीजन की कमी और फिसलन भरे रास्ते श्रद्धालुओं के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। जोखिम को कम करने के लिए फिलहाल यात्रा को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
पौराणिक महत्व और 12 वर्षों का इंतजार
नंदा देवी राजजात मात्र एक यात्रा नहीं, बल्कि पहाड़ की संवेदनाओं और कुलदेवी के प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। यह यात्रा हर 12 वर्ष में एक बार आयोजित होती है, जिसे मां नंदा की विदाई के रूप में देखा जाता है। मान्यता है कि विवाहित बेटी (नंदा देवी) अपने मायके (नंदाक क्षेत्र) से अपने ससुराल (कैलाश) की ओर प्रस्थान करती है।
लगभग 280 किलोमीटर की यह पैदल यात्रा चमोली के अंतिम गांव वांण से शुरू होकर रूपकुंड और फिर निर्जन होमकुंड तक जाती है। इस यात्रा का सबसे अनूठा हिस्सा ‘चौसिंग्या मेढ़ा’ (चार सींगों वाला भेड़) होता है, जो पूरी यात्रा में पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाता है। सातवीं-आठवीं सदी से चली आ रही इस परंपरा में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों के श्रद्धालु अपने देवी-देवताओं के निशानों के साथ शामिल होते हैं।
श्रद्धालुओं और आम जनमानस पर क्या होगा असर?
यात्रा के स्थगित होने से उन हजारों श्रद्धालुओं को अपनी योजनाएं बदलनी पड़ेंगी जो 2026 की गर्मियों या मानसून के बाद की तैयारियों में जुटे थे। हालांकि, इस फैसले का सकारात्मक पहलू यह है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा गया है।
-
तैयारी का अतिरिक्त समय: प्रशासन और मंदिर समितियों को यात्रा मार्ग के टूटे रास्तों, पुलों और विश्राम स्थलों की मरम्मत के लिए अब पर्याप्त समय मिल सकेगा।
-
आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव: स्थानीय व्यापारियों, होमस्टे संचालकों और खच्चर मालिकों को थोड़ा और इंतजार करना होगा, लेकिन एक सुव्यवस्थित यात्रा भविष्य में पर्यटन और स्थानीय रोजगार के लिए अधिक टिकाऊ साबित होगी।
-
धार्मिक अनुष्ठान जारी रहेंगे: समिति ने स्पष्ट किया है कि केवल ‘राजजात’ का मुख्य कार्यक्रम बदला है। वसंत पंचमी को होने वाले ‘मनौती महोत्सव’ और अन्य छोटे धार्मिक आयोजन पूर्व निर्धारित समय पर ही संपन्न होंगे।
आगे का रास्ता: ज्योतिषीय गणना तय करेगी नई तिथि
समिति के सचिव भुवन नौटियाल और अन्य पदाधिकारियों के अनुसार, राजकुंवरों द्वारा ज्योतिषीय गणना की जाएगी। वसंत पंचमी के दिन जब नई तिथि की घोषणा होगी, तब तक 2025 की आपदा से हुए नुकसान की भरपाई और बुनियादी ढांचा तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जब श्रद्धालु इस कठिन यात्रा पर निकलें, तो उन्हें मौसम की मार और असुरक्षित रास्तों का सामना न करना पड़े।
निष्कर्ष के तौर पर, नंदा देवी राजजात का स्थगन केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनशीलता के प्रति एक जिम्मेदारी भरा कदम है। प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर ही इस पावन यात्रा की गरिमा और श्रद्धालुओं की सुरक्षा अक्षुण्ण रखी जा सकती है।