कुमाऊँ की शान उत्तरायणी कौतिक: जानिए आयोजन की पूरी जानकारी

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बागेश्वर -उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में स्थित बागेश्वर नगर अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं पहचानों में सबसे महत्वपूर्ण है उत्तरायणी मेला, जो हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होता है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कुमाऊँ की सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और जनआंदोलनों का साक्षी रहा है।

उत्तरायणी मेला कब लगता है?

उत्तरायणी मेला हर साल 14 या 15 जनवरी को लगता है। यह तिथि मकर संक्रांति से जुड़ी होती है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी खगोलीय परिवर्तन को “उत्तरायणी” कहा जाता है, क्योंकि इसके बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर गमन करता है। इस पावन दिन पर सरयू और गोमती नदियों के संगम पर स्नान का विशेष महत्व माना जाता है।

मेला कितने दिन चलता है?

परंपरागत रूप से उत्तरायणी मेला 7 से 10 दिन तक चलता है। हालांकि भीड़, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार इसकी अवधि कभी-कभी बढ़ भी जाती है। मुख्य धार्मिक स्नान और पूजा-पाठ मकर संक्रांति के दिन होते हैं, जबकि इसके बाद के दिनों में सांस्कृतिक, व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियाँ चरम पर रहती हैं।

प्राचीन परंपरा और धार्मिक महत्व

उत्तरायणी मेले की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। प्राचीन काल में यह मेला साधु-संतों, व्यापारियों और तीर्थयात्रियों का प्रमुख मिलन स्थल था। दूर-दराज़ के गाँवों से लोग पैदल यात्रा कर यहाँ पहुँचते थे। संगम स्नान के बाद बागनाथ मंदिर में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती थी। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकगीत, भजन और कथाओं से पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक वातावरण में डूब जाता था।

सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान

समय के साथ उत्तरायणी मेला सामाजिक मेल-जोल का बड़ा मंच बन गया। यहाँ कुमाऊँ की लोकसंस्कृति अपने पूर्ण वैभव में दिखाई देती है। छोलिया नृत्य, झोड़ा-चांचरी, लोकगीत और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज मेले को जीवंत बनाती है। ग्रामीण जीवन से जुड़े हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्र, कृषि उत्पाद और स्थानीय व्यंजन मेले की रौनक बढ़ाते हैं। यह मेला पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुमाऊँनी संस्कृति को आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम रहा है।

ऐतिहासिक और राजनीतिक भूमिका

उत्तरायणी मेला केवल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा। ब्रिटिश काल में यह मेला जनआंदोलनों का केंद्र बना। 1921 में कुली-बेगार और अन्य शोषणकारी प्रथाओं के विरोध में यहाँ ऐतिहासिक जनसभा हुई। हजारों लोगों ने संगम तट पर एकत्र होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। इस तरह उत्तरायणी मेला स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक जागरण का भी प्रतीक बन गया।

व्यापार और अर्थव्यवस्था

पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात के सीमित साधनों के दौर में उत्तरायणी मेला व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। दूरस्थ इलाकों से व्यापारी ऊन, नमक, अनाज और हस्तशिल्प लेकर आते थे। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती थी और बागेश्वर एक प्रमुख व्यापारिक पड़ाव के रूप में उभरता गया।

आधुनिक स्वरूप

आज भी उत्तरायणी मेला उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। प्रशासन द्वारा सांस्कृतिक संध्याएँ, खेल प्रतियोगिताएँ और विकास प्रदर्शनी आयोजित की जाती हैं। आधुनिक सुविधाओं के बावजूद मेले की मूल आत्मा—लोकसंस्कृति, सामूहिकता और परंपरा—आज भी जीवित है।

निष्कर्ष

बागेश्वर का उत्तरायणी मेला हर साल मकर संक्रांति (14–15 जनवरी) से शुरू होकर लगभग एक सप्ताह या उससे अधिक समय तक चलता है। यह मेला आस्था, इतिहास, संस्कृति और जनचेतना का जीवंत संगम है, जो सदियों से लोगों को जोड़ता आ रहा है और भविष्य में भी अपनी ऐतिहासिक विरासत को सहेज कर रखेगा।

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