30 हजार रुपये बढ़े: उत्तराखंड में मंत्रियों की सुविधाओं में सरकार ने किया इजाफा

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देहरादून-उत्तराखंड शासन ने मुख्यमंत्री, मंत्रियों और राज्यमंत्रियों के मासिक यात्रा भत्ते को बढ़ाने की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। मंत्रिपरिषद सचिव शैलेश बगौली द्वारा गुरुवार को जारी आदेश के मुताबिक, मंत्रियों का यात्रा भत्ता अब 60 हजार रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 90 हजार रुपये प्रति माह कर दिया गया है। सरकार का तर्क है कि सरकारी दौरों और विभागीय कार्यों के दौरान होने वाले फुटकर खर्चों की प्रतिपूर्ति के लिए यह वृद्धि आवश्यक थी।

नियमों में संशोधन और कैबिनेट की मंजूरी

यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया है; सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई थी और सभी की सहमति के बाद इसे मंजूरी दी गई। उत्तराखंड में मंत्रियों के वेतन और भत्तों का निर्धारण ‘उत्तराखंड मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम 2009’ के तहत किया जाता है। हालांकि, यात्रा भत्ते का आधार ‘उत्तर प्रदेश मंत्री (यात्रा भत्ता) नियमावली 1997’ है, जिसे उत्तराखंड में भी लागू किया गया है। सरकार ने इसी पुरानी नियमावली में संशोधन करते हुए भत्ते की राशि में 50% का इजाफा किया है।

विपक्ष का तीखा हमला: जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग?

सरकार के इस कदम पर कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस फैसले को राज्य की गरीब जनता का अपमान बताया है। गोदियाल ने मांग की है कि प्रदेश के मंत्रियों के वेतन और बैंक खातों के उपयोग की उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए। उनका कहना है कि मंत्रियों की आलीशान जीवनशैली और उनकी आय के स्रोतों पर सवाल उठना लाजिमी है, खासकर तब जब राज्य आर्थिक संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। विपक्ष का आरोप है कि मंत्रियों को शायद ही अपना वेतन खर्च करने की जरूरत पड़ती हो, ऐसे में भत्ते बढ़ाना अनावश्यक है।

आम जनता पर प्रभाव और शासन की कार्यप्रणाली

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यह संशोधन मुख्यमंत्री, राज्यमंत्री और उपमंत्री सहित सभी पर लागू होगा। यदि मंत्री उत्तराखंड के भीतर या राज्य से बाहर विभागीय कार्यों के लिए यात्रा करते हैं, तो वे इस बढ़े हुए भत्ते के हकदार होंगे। पहले फुटकर खर्च की यह सीमा अधिकतम 60 हजार रुपये मासिक तक सीमित थी।

आम आदमी के नजरिए से देखें तो राज्य पर बढ़ते कर्ज और विकास कार्यों के लिए फंड की कमी के बीच वीआईपी खर्चों में ऐसी बढ़ोतरी चर्चा का विषय बनी हुई है। जनता में यह संदेश जा रहा है कि एक तरफ आम आदमी महंगाई और सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं में लगातार इजाफा किया जा रहा है।

निष्कर्ष: जनहित बनाम सरकारी खर्च

लोकतंत्र में सरकारों को अपनी छवि और खर्चों के बीच संतुलन बनाना होता है। यात्रा भत्ते में 30 हजार रुपये की यह वृद्धि तकनीकी रूप से नियमावली संशोधन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन इसका नैतिक पक्ष विवादों में है। आने वाले समय में यह मुद्दा विधानसभा से लेकर सड़क तक गरमाने की उम्मीद है, क्योंकि जनता अब अपने टैक्स के पैसे के इस्तेमाल पर पैनी नजर रखने लगी है।

उत्तराखंड सरकार द्वारा मुख्यमंत्री और मंत्रियों के यात्रा भत्ते में की गई भारी वृद्धि के बाद अब इस फैसले के तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर चर्चा तेज हो गई है। सरकार ने उत्तर प्रदेश मंत्री (यात्रा भत्ता) नियमावली 1997 में संशोधन कर इस आर्थिक लाभ का मार्ग प्रशस्त किया है। इस संशोधन के लागू होने के बाद अब मंत्रियों के पास सरकारी दौरों के दौरान फुटकर खर्चों के लिए प्रति माह 90 हजार रुपये का बजट उपलब्ध होगा, जो पहले केवल 60 हजार रुपये तक ही सीमित था। सचिव मंत्रिपरिषद शैलेश बगौली ने इस संबंध में गुरुवार को आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह वृद्धि तत्काल प्रभाव से लागू मानी जाएगी।

इस प्रशासनिक निर्णय ने प्रदेश में एक नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है, जहाँ विपक्ष ने इसे राज्य के सीमित आर्थिक संसाधनों की बर्बादी बताया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कड़े शब्दों में कहा है कि एक ओर राज्य की जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी ओर मंत्रियों के आलीशान जीवन और शानो-शौकत के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोला जा रहा है। उन्होंने मांग की है कि मंत्रियों को मिलने वाले वेतन और बैंक खातों के उपयोग की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, क्योंकि राज्य के आर्थिक हालात ऐसे फैसलों की अनुमति नहीं देते। सरकार के इस कदम को जनता के साथ एक ‘मजाक’ की संज्ञा देते हुए विपक्ष ने संकेत दिए हैं कि वे इस मुद्दे को जनहित के नजरिए से आगे भी उठाएंगे।

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