
देहरादून-उत्तराखंड की ग्रामीण शासन व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर पंचायती राज विभाग ने पंचायत घरों के निर्माण के लिए दी जाने वाली धनराशि को दोगुना करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। वर्तमान में राज्य सेक्टर के अंतर्गत एक पंचायत घर के निर्माण के लिए 10 लाख रुपये का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर अब 20 लाख रुपये करने का प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। इस निर्णय से राज्य की उन सैंकड़ों ग्राम पंचायतों को लाभ मिलेगा जो धन के अभाव में अब तक अपने निजी कार्यालय भवन से वंचित थीं।
बजट में बढ़ोतरी की आवश्यकता और वर्तमान चुनौती
राज्य में पंचायत घरों के निर्माण की प्रक्रिया लंबे समय से बजट की कमी के कारण बाधित हो रही थी। पंचायती राज विभाग के अधिकारियों के विश्लेषण के अनुसार, केंद्र सरकार एक पंचायत भवन के लिए 20 लाख रुपये की सहायता देती है, जबकि राज्य सरकार की ओर से मात्र 10 लाख रुपये का ही प्रावधान था। इतनी कम धनराशि में पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण भवन निर्माण करना लगभग असंभव साबित हो रहा था। यही कारण है कि राज्य सेक्टर से मिलने वाली राशि से कई पंचायत भवनों का काम या तो शुरू नहीं हो पाया या बीच में ही अटक गया। अब वित्त विभाग की मंजूरी और कैबिनेट के फैसले के बाद यह विसंगति दूर हो जाएगी।
803 पंचायतों के पास आज भी नहीं है अपना भवन
राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के बावजूद उत्तराखंड की 803 ग्राम पंचायतें ऐसी हैं, जिनके पास अपना पंचायत घर नहीं है। इन पंचायतों का कामकाज या तो किराए के कमरों में चल रहा है या फिर अन्य सार्वजनिक भवनों से संचालित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, राज्य में कुल 1300 से अधिक ऐसे पंचायत घर हैं जिनका या तो नवनिर्माण होना है या वे अत्यधिक जर्जर स्थिति में हैं। उप निदेशक मनोज कुमार तिवारी के मुताबिक, विभाग ने सभी जिलों के पंचायत राज अधिकारियों (DPD) से वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट मांगी है, ताकि प्राथमिकता के आधार पर बजट आवंटित किया जा सके।
पंचायती राज विभाग की रणनीति और आगामी कदम
विभागीय स्तर पर इसकी तैयारी पूरी कर ली गई है। पंचायती राज विभाग के उप निदेशक मनोज कुमार तिवारी ने पुष्टि की है कि केंद्र सरकार की तर्ज पर बजट को 20 लाख रुपये करने का विस्तृत प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा जा चुका है। वित्त विभाग से हरी झंडी मिलते ही इसे कैबिनेट की बैठक में लाया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि अगले वित्तीय वर्ष के भीतर उन सभी 803 पंचायतों में निर्माण कार्य शुरू करा दिया जाए, जहाँ वर्तमान में भूमि उपलब्ध है लेकिन भवन की कमी है।
आम आदमी और ग्रामीण व्यवस्था पर प्रभाव
एक पंचायत घर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं होता, बल्कि यह गांव की सरकार का सचिवालय होता है। बजट बढ़ने से अब पंचायत घरों में आधुनिक सुविधाएं जैसे कंप्यूटर रूम, मीटिंग हॉल और कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के लिए पर्याप्त स्थान मिल सकेगा। इससे ग्रामीणों को प्रमाण पत्र बनवाने, सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने और ग्राम सभा की बैठकें आयोजित करने में सुविधा होगी। जब पंचायत के पास अपनी छत होगी, तो विकास कार्यों की योजना बनाना और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करना आसान हो जाएगा।
आगे क्या बदलेगा?
धनराशि में इस 100% की वृद्धि के बाद राज्य में पंचायत भवनों के निर्माण की गुणवत्ता में बड़ा सुधार आएगा। अब ठेकेदारों और ग्राम पंचायतों को बजट की कमी का बहाना नहीं मिलेगा। भविष्य में इन पंचायत घरों को ‘स्मार्ट विलेज’ की अवधारणा से जोड़ा जाएगा, जहाँ इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी की बेहतर सुविधा होगी। इसके अलावा, जर्जर हो चुके पुराने भवनों को ध्वस्त कर वहां नए मानकों के अनुसार बहुउद्देशीय भवनों का निर्माण किया जा सकेगा, जो आपदा के समय भी सामुदायिक केंद्रों के रूप में काम आ सकेंगे।
ग्राम प्रधानों और जनप्रतिनिधियों को क्या होगा फायदा?
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्राम प्रधानों के लिए यह खबर किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। अब तक वे कम बजट के कारण निर्माण कार्य कराने से कतराते थे, क्योंकि 10 लाख रुपये में मानक के अनुरूप भवन तैयार करना कठिन था। अब 20 लाख रुपये की धनराशि मिलने से वे गांवों में गौरवशाली और मजबूत पंचायत भवनों का निर्माण करा सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे और ग्रामीणों का भरोसा प्रशासनिक तंत्र पर और अधिक मजबूत होगा।
निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)
मुख्यमंत्री द्वारा पंचायत घरों का बजट बढ़ाने का निर्देश राज्य की जमीनी राजनीति और विकास के लिए एक दूरगामी फैसला है। राज्य की प्रगति तभी संभव है जब हमारी ग्राम पंचायतें सशक्त और आत्मनिर्भर हों। 803 ग्राम पंचायतों को अपनी छत मिलना राज्य की रजत जयंती वर्ष के संकल्पों को पूरा करने की दिशा में एक ठोस कदम है। वित्त विभाग और कैबिनेट की मुहर के बाद, यह योजना उत्तराखंड के ग्रामीण बुनियादी ढांचे की तस्वीर बदलने वाली साबित होगी।