
चम्पावत-मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार द्वारा ग्रामीण आजीविका सुधार और महिला सशक्तिकरण के लिए चलाए जा रहे अभियान अब धरातल पर बड़े बदलाव का कारण बन रहे हैं। इसी सकारात्मक परिवर्तन की एक जीती-जागती तस्वीर चम्पावत विकासखंड के नायकगोठ गांव में देखने को मिली है। यहाँ की निवासी आरती देवी ने न केवल अपनी गरीबी को मात दी है, बल्कि सरकारी सहायता और अपने कठिन परिश्रम से स्वरोजगार की एक नई इबारत लिखी है। आरती देवी की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि यदि सही मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग मिले, तो पहाड़ की महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा भी बन सकती हैं।
स्वयं सहायता समूह से मिली स्वरोजगार की राह
आरती देवी की सफलता की शुरुआत एनआरएलएम (NRLM) द्वारा गठित ‘किसान स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने के साथ हुई। वह ग्रामोत्थान परियोजना द्वारा अनुबंधित ‘ओम विकास संकुल’ की सक्रिय सदस्य बनीं। समूह की नियमित बैठकों में शामिल होने के दौरान उन्हें राज्य सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और उद्यम आधारित गतिविधियों की जानकारी मिली। आरती हमेशा से अपने परिवार की आय बढ़ाना चाहती थीं, ताकि उनके बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके। समूह के माध्यम से उन्हें यह समझ में आया कि गौपालन उनके लिए आजीविका का एक टिकाऊ और सम्मानजनक जरिया बन सकता है।
ग्रामोत्थान परियोजना: आर्थिक मजबूती का आधार
आरती देवी के सपनों को पंख लगाने का काम ‘ग्रामोत्थान परियोजना’ ने किया। आपको बता दें कि यह परियोजना आईफैड (IFAD) और केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है, जिसे राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से ग्रामीण पलायन रोकने और गरीब परिवारों की आय बढ़ाने के लिए संचालित किया जा रहा है। परियोजना की टीम ने आरती देवी के प्रस्ताव का भौतिक सत्यापन किया और मानकों के अनुसार उन्हें गौपालन हेतु कुल ₹1,00,000 की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई। इस वित्तीय ढांचे में ₹30,000 परियोजना का सीधा सहयोग, ₹50,000 बैंक ऋण (परियोजना के माध्यम से) और ₹20,000 लाभार्थी का अपना अंशदान शामिल था।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
सहायता राशि प्राप्त होने के बाद आरती देवी ने एक उत्तम नस्ल की गाय खरीदी और पूरी निष्ठा के साथ गौपालन का कार्य प्रारंभ किया। हालांकि, शुरुआत में पशु प्रबंधन और बाजार की समझ विकसित करने में कुछ कठिनाइयां आईं, लेकिन आरती ने हार नहीं मानी। आज उनकी मेहनत का परिणाम सबके सामने है। उनकी गाय प्रतिदिन 6 से 7 लीटर दूध दे रही है, जिससे उन्हें स्थानीय बाजार में दूध बेचकर ₹5,000 से ₹6,000 प्रति माह की शुद्ध आय हो रही है। यह आय उनके परिवार के लिए एक बड़ा सहारा साबित हो रही है और वह नियमित रूप से अपने बैंक ऋण की किस्तें भी चुका रही हैं।
पलायन पर चोट और आजीविका का संरक्षण
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन एक बड़ी चुनौती रहा है। आरती देवी जैसी महिलाओं की सफलता यह सिद्ध करती है कि यदि गांवों में ही स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो पलायन को प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। ग्रामोत्थान परियोजना का मूल उद्देश्य भी यही है कि ग्रामीण संसाधनों का उपयोग कर स्थानीय स्तर पर ही रोजगार सृजित किए जाएं। आरती अब अपने गांव में अन्य महिलाओं के लिए एक ‘रोल मॉडल’ बन गई हैं, जो उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
जनता और समाज पर प्रभाव
आरती देवी की इस कहानी का व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ा है। चम्पावत जिले के अन्य गांवों में भी अब महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने के लिए आगे आ रही हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ा है और महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता में सुधार हुआ है। जब एक महिला आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है, तो उसका पूरा परिवार शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक होता है। आरती की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सही लाभार्थी तक पहुंचकर वे जीवन बदल रही हैं।
आगे क्या बदलेगा?
आरती देवी अब अपने डेयरी व्यवसाय को और विस्तार देने की योजना बना रही हैं। वह आने वाले समय में एक और गाय खरीदने और जैविक खाद (वर्मी कंपोस्ट) तैयार करने का विचार कर रही हैं। राज्य सरकार की योजना है कि आरती जैसी हजारों महिलाओं को लखपति दीदी योजना के तहत प्रशिक्षित किया जाए। इससे भविष्य में चम्पावत जिला दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में एक हब बनकर उभर सकता है। आने वाले समय में डिजिटल पेमेंट और बेहतर मार्केट लिंकेज के जरिए इन महिलाओं के उत्पादों को बड़े शहरों के बाजारों तक पहुंचाने की तैयारी भी की जा रही है।
निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का महिला सशक्तिकरण का विजन आरती देवी जैसी मेहनती महिलाओं के जरिए साकार हो रहा है। ग्रामोत्थान परियोजना ने यह दिखा दिया है कि यदि वित्तीय सहायता को सही प्रशिक्षण और मॉनिटरिंग के साथ जोड़ा जाए, तो ग्रामीण गरीबी को जड़ से खत्म किया जा सकता है। यह सफलता केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की महिलाओं के आत्मविश्वास की जीत है। यह संदेश साफ है—आत्मनिर्भर उत्तराखंड की नींव हमारी उद्यमी मातृशक्ति ही रखेगी।