
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक मानवीय बदलाव की मूक क्रांति चल रही है। सड़कों पर हाथ फैलाने को मजबूर बचपन अब कंप्यूटर की की-बोर्ड पर उंगलियां चला रहा है। जिला प्रशासन द्वारा संचालित आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर (ICC) न केवल बच्चों को भिक्षावृत्ति और बालश्रम के दलदल से बाहर निकाल रहा है, बल्कि उनके मानसिक पुनर्वास (माइंड रिफॉर्मेशन) का एक ऐसा मॉडल बन गया है, जो अब देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के लिए शोध का विषय है। मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में शुरू हुई इस पहल के तहत अब तक 154 बच्चों को विभिन्न स्कूलों में दाखिल कराकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा चुका है। यह केंद्र महज एक आश्रय स्थल नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए ‘उम्मीद की पाठशाला’ बन गया है जिन्होंने कभी स्कूल की दहलीज नहीं देखी थी।
शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ा बचपन: क्या है यह पूरी पहल?
देहरादून जिला प्रशासन ने दिसंबर 2024 में एक विशेष अभियान की शुरुआत की थी। इसका मुख्य उद्देश्य शहर के चौराहों, डंपिंग यार्ड्स और बाजारों में भिक्षावृत्ति, कूड़ा बीनने या बालश्रम में लगे बच्चों को रेस्क्यू करना था। इन बच्चों को सीधे स्कूल भेजने के बजाय पहले ‘इंटेंसिव केयर सेंटर’ (ICC) लाया गया। साधुराम इंटर कॉलेज में स्थापित इस केंद्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यहाँ बच्चों को सीधे किताबी ज्ञान देने से पहले उनके व्यवहार में बदलाव लाने पर काम किया जाता है।
अक्सर भिक्षावृत्ति या मजदूरी में लगे बच्चों का मन पढ़ाई से उचटा हुआ होता है। आईसीसी में उन्हें खेल, संगीत, योग और काउंसलिंग के जरिए मानसिक रूप से तैयार किया गया। शनिवार को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि तब हासिल हुई जब 27 और बच्चों को इस केंद्र से निकालकर नियमित सरकारी स्कूलों में प्रवेश दिलाया गया। अब तक कुल 267 बच्चों को रेस्क्यू किया जा चुका है, जिनमें से 154 बच्चे अब बाकायदा स्कूल जा रहे हैं।
शोध और अध्ययन का केंद्र बना ICC
इस केंद्र की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब शैक्षणिक जगत के विशेषज्ञ और छात्र यहाँ का दौरा कर रहे हैं। हाल ही में आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी के 12 छात्र-छात्राओं ने सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र यादव के नेतृत्व में यहाँ का भ्रमण किया। विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए यह एक शोध का विषय है कि कैसे एक अल्प अवधि में बच्चों की मानसिकता को बदला गया।
भ्रमण के दौरान बच्चों ने खुद के बनाए स्वागत कार्ड और नृत्य प्रस्तुतियों से अतिथियों का स्वागत किया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि जो बच्चे कल तक सड़क पर लोगों के सामने हाथ फैलाते थे, आज उनमें आत्मविश्वास और टीमवर्क की भावना कूट-कूट कर भरी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि यहाँ की कार्यप्रणाली अन्य राज्यों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकती है।
क्यों पड़ी इस सेंटर की जरूरत? (कारण और परिस्थितियां)
शहरी क्षेत्रों में भिक्षावृत्ति एक बड़ी सामाजिक समस्या रही है। इसके पीछे अक्सर संगठित गिरोह या पारिवारिक मजबूरी होती है। देहरादून जिला प्रशासन ने महसूस किया कि केवल बच्चों को सड़कों से हटा देना काफी नहीं है, क्योंकि वे वापस उसी काम में लौट जाते हैं।
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मानसिक अवरोध: इन बच्चों के मन में स्कूल को लेकर एक डर या अरुचि होती है।
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सामाजिक दूरी: समाज और इन बच्चों के बीच एक गहरी खाई थी, जिसे पाटने के लिए एक ‘ट्रांजिशन फेज’ (संक्रमण काल) की जरूरत थी।
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सुविधाओं का अभाव: गरीब परिवारों के पास बच्चों को स्कूल भेजने के लिए न तो संसाधन थे और न ही परिवहन की सुविधा।
इन सभी चुनौतियों को देखते हुए जिलाधिकारी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर आईसीसी में कंप्यूटर लैब, संगीत कक्ष और बच्चों के घर से सेंटर तक आने-जाने के लिए विशेष कैब की व्यवस्था सुनिश्चित की।
आम आदमी और समाज पर क्या होगा असर?
इस पहल का सीधा असर देहरादून की सामाजिक संरचना पर पड़ रहा है। जब सड़कों से भिक्षावृत्ति कम होती है, तो शहर की छवि सुरक्षित और प्रगतिशील बनती है।
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अपराध में कमी: शिक्षा से वंचित बच्चे अक्सर असामाजिक गतिविधियों की ओर मुड़ जाते हैं। उन्हें स्कूल भेजकर प्रशासन भविष्य के संभावित अपराधों को रोक रहा है।
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जागरूकता: जब एक गरीब बस्ती का बच्चा स्कूल जाकर पढ़ता-लिखता है, तो उसके पूरे परिवार और पड़ोस में शिक्षा के प्रति सकारात्मक संदेश जाता है।
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संवेदनशीलता: यूनिवर्सिटी के छात्रों और सामाजिक संगठनों के जुड़ने से समाज में इन बच्चों के प्रति नफरत या उपेक्षा के बजाय सहानुभूति और सहयोग का भाव पैदा हो रहा है।
भविष्य की राह: पूर्ण सेचुरेशन का लक्ष्य
जिला प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि यह अभियान तब तक नहीं रुकेगा जब तक जिले का एक भी बच्चा शिक्षा से वंचित है। जिलाधिकारी ने अभिभावकों से मार्मिक अपील करते हुए कहा है कि शिक्षा ही वह हथियार है जिससे गरीबी की जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं। आने वाले समय में इस मॉडल को जिले के अन्य हिस्सों में भी विस्तार देने की योजना है। प्रशासन अब उन 113 बच्चों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है जो अभी आईसीसी में उपचारात्मक शिक्षा (Remedial Education) ले रहे हैं, ताकि जल्द ही उन्हें भी स्कूलों में दाखिला दिलाया जा सके।
निष्कर्ष: मानवीय दृष्टिकोण से बड़ा बदलाव
यह प्रोजेक्ट केवल सरकारी आंकड़ों का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह टूटे हुए बचपन को जोड़ने की एक संवेदनशील कोशिश है। कूड़ा बीनने वाले हाथों में जब कंप्यूटर का माउस आता है, तो वह केवल एक बच्चे का नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदलता है। देहरादून का यह ‘इंटेंसिव केयर सेंटर’ साबित कर रहा है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने का रास्ता खुद-ब-खुद बन जाता है।