यूपीसीएल मुख्यालय में गूंजी विरोध की आवाज, 16 वर्षों से प्रमोशन का इंतजार कर रहे इंजीनियर

Upcl
Responsive example

आर-पार की जंग: उत्तरांचल पॉवर इंजीनियर्स एसोसिएशन का दूसरे दिन भी हल्लाबोल, प्रमोशन पर फंसा पेंच

देहरादून। उत्तराखंड के ऊर्जा निगमों में प्रशासनिक गतिरोध अब बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। उत्तरांचल पॉवर इंजीनियर्स एसोसिएशन ने अपनी लंबित मांगों, विशेषकर अधिशासी अभियंता के 40 रिक्त पदों पर पदोन्नति न होने के विरोध में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन यूपीसीएल मुख्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। आंदोलन के इस दूसरे चरण में इंजीनियरों ने प्रबंधन पर वादाखिलाफी का गंभीर आरोप लगाया है। एसोसिएशन ने साफ कर दिया है कि जब तक तकनीकी संवर्ग की समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक उनकी आवाज मुख्यालय के गलियारों में गूंजती रहेगी।

पूरा घटनाक्रम और पृष्ठभूमि

मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को यूपीसीएल मुख्यालय में आयोजित इस विरोध सभा की अध्यक्षता अधीक्षण अभियंता मनदीप सिंह राणा द्वारा की गई। विरोध का मुख्य केंद्र बिंदु वह प्रशासनिक देरी है, जिसके कारण दर्जनों सहायक अभियंता पदोन्नति से वंचित हैं।

एसोसिएशन के महासचिव राहुल चानना ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि माननीय न्यायालय के आदेशानुसार वरिष्ठता सूची काफी पहले जारी की जा चुकी है और वर्तमान में इस पर किसी भी प्रकार का कोई कानूनी स्थगन (Stay) प्रभावी नहीं है। उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि पदोन्नत सहायक अभियंता द्वारा दायर की गई अवमानना याचिका भी माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 3 जनवरी 2026 को खारिज की जा चुकी है। इसके बावजूद, प्रबंधन अपने उस लिखित और मौखिक आश्वासन से पीछे हट रहा है जिसमें याचिका खारिज होने के तुरंत बाद पदोन्नति आदेश जारी करने की बात कही गई थी।

कारण और परिस्थितियाँ

इस आंदोलन के पीछे के कारण केवल पदोन्नति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह विभाग के भीतर व्याप्त गहरे असंतोष का परिणाम है:

  • पदों की भारी कमी: कारपोरेशन में अधिशासी अभियंता के कुल 93 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 40 से अधिक पद रिक्त चल रहे हैं।

  • दोहरा कार्यभार: रिक्तियों के कारण फील्ड और मुख्यालय में तैनात अभियंताओं को एक साथ कई-कई प्रभार देखने पड़ रहे हैं। इससे न केवल उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है, बल्कि व्यक्तिगत तनाव भी बढ़ रहा है।

  • लंबे समय से उपेक्षा: एसोसिएशन के अध्यक्ष युद्धवीर सिंह तोमर के अनुसार, सीधी भर्ती के सहायक अभियंता पिछले 16 वर्षों से अपनी पहली पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं, जो सेवा नियमावली और कर्मचारी हितों का खुला उल्लंघन है।

  • अन्य वित्तीय लाभ: नवनियुक्त सहायक अभियंताओं के विभागीय संयोजन, प्रारंभिक इंक्रीमेंट के लाभ और स्थायीकरण जैसे मुद्दों पर भी प्रबंधन केवल समय टालने की नीति अपना रहा है।

जनता और पाठकों पर प्रभाव

इंजीनियरों के इस आंदोलन का सबसे बड़ा खामियाजा उत्तराखंड की जनता को भुगतना पड़ सकता है। जब अधिशासी अभियंता जैसे महत्वपूर्ण पदों पर 40% से अधिक की कमी हो, तो तकनीकी निर्णयों में देरी होना स्वाभाविक है। बिजली फाल्ट को ठीक करने की निगरानी, नए ट्रांसफार्मर लगाने की प्रक्रिया और बिलिंग संबंधी शिकायतों का निस्तारण सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है। यदि इंजीनियरों का यह विरोध कार्य बहिष्कार में बदलता है, तो प्रदेश में बिजली आपूर्ति चरमरा सकती है और स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स की गति भी धीमी पड़ सकती है।

आगे क्या बदलेगा

एसोसिएशन के कड़े रुख को देखते हुए यह स्पष्ट है कि कल, 11 फरवरी 2026 को भी यूपीसीएल मुख्यालय में विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। यदि प्रबंधन इस बीच कोई सार्थक पहल नहीं करता है, तो आंदोलन का स्वरूप और अधिक आक्रामक हो सकता है। आने वाले दिनों में जिलेवार विरोध प्रदर्शन और मुख्यालय पर अनिश्चितकालीन धरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे शासन स्तर पर ऊर्जा सचिव और मुख्य सचिव की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी, जिन्हें हस्तक्षेप कर इस विवाद को सुलझाना होगा।

आम आदमी को क्या फायदा या असर

एक आम उपभोक्ता के लिए यह जानना जरूरी है कि बिजली विभाग के भीतर चल रहा यह संघर्ष सेवाओं की गुणवत्ता को तय करेगा। यदि रिक्त पदों पर पदोन्नति होती है, तो फील्ड में अनुभवी अधिकारियों की संख्या बढ़ेगी, जिससे फाल्ट ठीक होने की दर तेज होगी। वहीं, अगर विभाग में असंतोष बना रहा, तो तकनीकी स्टाफ की कमी के कारण उपभोक्ताओं को मिलने वाली सुविधाएं जैसे नया कनेक्शन या मीटर रिप्लेसमेंट में लंबा समय लगेगा।

निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)

किसी भी सार्वजनिक संस्थान की सफलता उसके मानव संसाधन के कुशल प्रबंधन पर टिकी होती है। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहाँ ऊर्जा ही राजस्व का मुख्य स्रोत है, वहां अनुभवी इंजीनियरों को 16 साल तक एक ही पद पर रखना और स्वीकृत पदों को खाली रखना न केवल विभागीय विफलता है, बल्कि जनहित की अनदेखी भी है। प्रबंधन को चाहिए कि वह कानूनी बाधाएं समाप्त होने के बाद त्वरित निर्णय ले, ताकि प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था निर्बाध रूप से चलती रहे।


विरोध सभा के मुख्य सहभागी

आज आयोजित इस महत्वपूर्ण विरोध सभा में एसोसिएशन के अध्यक्ष युद्धवीर तोमर, महासचिव राहुल चानना, मुख्य अभियंता जसवंत सिंह, मोहित जोशी, एन एस बिष्ट, नवीन मिश्रा, विकास गुप्ता, अनिल धीमान, मोहित डबराल के साथ-साथ विपिन कुमार, मुकेश कुमार, सौरभ पांडे, शैलेश मिश्रा, हिमांशु बडोनी, श्वेता, मीनाक्षी, कल्पना, नीति, अनुज और आशीष समेत दर्जनों अभियंता अपनी आवाज बुलंद करने पहुंचे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *