
देवभूमि उत्तराखंड, विशेष कर कुमाऊँ अंचल में होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। फागुन के महीने के साथ ही यहाँ की आबोहवा में लोक संगीत, राग-रागनियों और होली की बैठकों की महक घुलने लगती है। इस वर्ष होली का यह उत्सव 27 फरवरी से शुरू हो रहा है, जो आगे चलकर कई महत्वपूर्ण धार्मिक और खगोलीय घटनाओं का साक्षी बनेगा। इस खबर में हम आपको होली के कार्यक्रमों और चंद्र ग्रहण से जुड़ी पूरी जानकारी देंगे, ताकि आप समय रहते अपनी तैयारी कर सकें।
होली का पर्व: तिथियां और कार्यक्रम
होली के पारंपरिक कार्यक्रम का प्रारंभ ‘आंवला एकादशी’ से होता है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कुमाऊँनी होली के औपचारिक शुभारंभ का भी प्रतीक है।
महत्वपूर्ण तिथियों का विवरण:
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27 फरवरी (आंवला एकादशी): इसी दिन होली का शुभ आरंभ होगा और आंवला एकादशी का व्रत रखा जाएगा।
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चीर बंधन और रंग डालने का समय: परंपरा के अनुसार, इस दिन प्रातः सूर्योदय से लेकर 11:32 बजे तक का समय रंग डालने और चीर बंधन के लिए निर्धारित है।
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2 मार्च (होलिका दहन): होलिका दहन का शुभ मुहूर्त सायंकाल 6:10 बजे से लेकर रात्रि 8:39 बजे तक रहेगा।
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4 मार्च (रंगभरी होली): इस दिन होली का मुख्य उत्सव ‘रंगभरी होली’ के रूप में मनाया जाएगा।
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5 मार्च (दंपति टीका): होली के कार्यक्रमों के समापन स्वरूप इस दिन दंपति टीका का आयोजन होगा।
कुमाऊँ में ‘बैठकी होली’ की परंपरा सदियों पुरानी है। गाँव-गाँव में बैठकों का आयोजन होता है, जहाँ शास्त्रीय संगीत पर आधारित होरियार गाए जाते हैं। इस बार भी 27 फरवरी से इन बैठकों का दौर शुरू हो जाएगा, जो वातावरण को भक्ति और उल्लास से भर देगा।
चंद्र ग्रहण और सूतक काल: सावधानी और नियम
होली के इन उल्लासपूर्ण दिनों के बीच 3 मार्च को एक खगोलीय घटना भी घटित होने जा रही है। 3 मार्च को चंद्र ग्रहण है, जिसे लेकर शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल का विशेष महत्व होता है।
ग्रहण की समय-सीमा:
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यह ग्रहण दिन में 3:20 बजे से प्रारंभ होकर सायंकाल 6:47 बजे तक रहेगा।
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पूरे देश में ग्रहण का समापन सायंकाल 6:47 बजे होगा।
उत्तराखंड के लिए विशेष जानकारी:
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उत्तराखंड में चंद्र ग्रहण सायंकाल 6:17 बजे दिखाई देगा।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूतक काल के दौरान पूजा-पाठ वर्जित माना जाता है। इस ग्रहण के लिए प्रातः 9:17 बजे से सूतक काल का प्रारंभ माना जाना चाहिए।
सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं और भोजन बनाने व खाने से जुड़ी कई सावधानियां बरती जाती हैं। उत्तराखंड के निवासियों को सलाह दी जाती है कि वे धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हुए इस दौरान विशेष सतर्कता बरतें।
जनमानस पर प्रभाव और सावधानियां
पहाड़ में होली का रंग हर किसी को अपनी ओर खींचता है। यह वह समय होता है जब दूर-दराज में रहने वाले लोग अपने घरों को लौटते हैं। हालांकि, इस बार होली के ठीक आसपास चंद्र ग्रहण होने के कारण, लोगों को धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में सामंजस्य बिठाना होगा।
पाठकों के लिए सुझाव:
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योजना बनाएं: चूंकि 27 फरवरी से होली शुरू हो रही है, इसलिए अपने कामकाज और त्योहार की व्यस्तताओं का तालमेल पहले ही बना लें।
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सूतक का पालन: 3 मार्च को सूतक काल के दौरान होने वाली गतिविधियों को ध्यान में रखें। ग्रहण के समय धार्मिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।
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पारंपरिक रंगों का उपयोग: होली खेलते समय प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों का ही उपयोग करें। रासायनिक रंगों से त्वचा और आंखों को नुकसान हो सकता है।
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सामुदायिक सौहार्द: कुमाऊँनी होली भाईचारे का संदेश देती है। इस वर्ष भी इसे शांति और सौहार्द के साथ मनाएं।
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में पूरे कुमाऊँ में ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई देगी। चीर बंधन के साथ ही होली की जो शुरुआत होगी, वह होलिका दहन के बाद रंगभरी होली तक अपने चरम पर होगी। 5 मार्च को दंपति टीका के साथ होली के इन कार्यक्रमों का समापन होगा।
निष्कर्ष
देवभूमि में होली का त्योहार आस्था और मनोरंजन का अद्भुत संगम है। हालांकि इस बार चंद्र ग्रहण की खगोलीय स्थिति ने कुछ चुनौतियों के साथ इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। हमें अपनी परंपराओं का पालन करते हुए और विज्ञान सम्मत सावधानियां बरतते हुए इस पर्व को मनाना चाहिए।
आशा है कि यह जानकारी आपके आगामी त्योहारों की योजना बनाने में सहायक होगी। देवभूमिदीप की ओर से सभी को आने वाली होली की अग्रिम शुभकामनाएं।