
अल्मोड़ा- जनपद के किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने और पारंपरिक खेती को आधुनिक व्यवसाय से जोड़ने के लिए द्वाराहाट के कुवाली में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। न्याय पंचायत कुवाली में आयोजित इस विशेष बैठक में ‘किसान उत्पादक संगठन’ (एफपीओ) के गठन और उसके सुदृढ़ीकरण पर विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। नाबार्ड और सामाजिक विकास एवं प्रबंध समिति (SVEPS) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र बिंदु वैज्ञानिक तरीके से मौन पालन (मधुमक्खी पालन) को बढ़ावा देना और स्थानीय कृषि उत्पादों के लिए एक मजबूत बाजार तैयार करना है। इस अभियान का लक्ष्य क्षेत्र के 750 किसानों को एक मंच पर लाकर उन्हें बिचौलियों के चंगुल से मुक्त करना और उनके उत्पादों को एक ब्रांड के रूप में पहचान दिलाना है।
अल्मोड़ा में कृषि क्रांति की तैयारी: कुवाली में एफपीओ पर मंथन
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में खेती और आजीविका को जंगली जानवरों और पलायन जैसी चुनौतियों के बीच एक नई दिशा देने की कवायद तेज हो गई है। इसी क्रम में 27 जनवरी 2026 को अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट विकास खंड अंतर्गत कुवाली पंचायत घर में एक उच्च स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। सामाजिक विकास एवं प्रबंध समिति (SVEPS) के तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में कृषि विशेषज्ञों और वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधियों ने शिरकत की।
संस्था के मुख्य कार्यकारी शंभू दत्त जोशी ने कार्यशाला की शुरुआत करते हुए स्पष्ट किया कि इस पहल का विस्तार अल्मोड़ा के छह प्रमुख विकासखंडों—हवालबाग, लमगड़ा, धौलादेवी, भैसियाछाना, ताकुला और द्वाराहाट तक होगा। बैठक का प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसा ढांचा तैयार करना है जहां किसान केवल उत्पादक न रहकर एक उद्यमी की भूमिका में आ सकें। इसके लिए 750 सदस्यों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, जो सहकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेंगे।
वैज्ञानिक मौन पालन: पहाड़ की नई पहचान
बैठक में सबसे अधिक जोर वैज्ञानिक विधि से मौन पालन पर दिया गया। वरिष्ठ कीट विज्ञानी पी एस कनवाल ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि अल्मोड़ा की जलवायु शहद उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है। उन्होंने आधुनिक बॉक्स के उपयोग, रोगों से बचाव और उच्च गुणवत्ता वाले शहद के उत्पादन की तकनीक पर प्रकाश डाला। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यक्तिगत स्तर के बजाय एफपीओ के माध्यम से शहद का संग्रह, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की जाए, तो स्थानीय शहद को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।
मौजूदा समय में पहाड़ के किसानों के पास संसाधनों और सही विपणन (मार्केटिंग) रणनीति की कमी है। इसी कमी को दूर करने के लिए एफपीओ एक पुल का कार्य करेगा। इसमें न केवल शहद, बल्कि स्थानीय फलों और अनाजों के मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर भी चर्चा की गई।
नाबार्ड का सहयोग और वित्तीय ढांचा
नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक गिरीश चंद्र पंत ने एफपीओ के तकनीकी और वित्तीय पहलुओं पर जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की सफलता उसकी पारदर्शिता और कुशल प्रबंधन पर टिकी होती है। पंत ने एफपीओ के लिए उपलब्ध विभिन्न ऋण सुविधाओं, कार्यशील पूंजी और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए मिलने वाले अनुदानों के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने सुझाव दिया कि एफपीओ के निदेशक मंडल को लगातार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और वित्तीय लेखा-जोखा रखने में सक्षम हो सकें। नाबार्ड का लक्ष्य है कि किसानों को सूक्ष्म वित्त के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जाए ताकि उन्हें खेती के लिए साहूकारों पर निर्भर न रहना पड़े।
विभागीय समन्वय और भविष्य की राह
उद्यान विभाग की सहायक विकास अधिकारी रेनु अधिकारी ने आश्वासन दिया कि विभाग एफपीओ को हर संभव तकनीकी सहायता प्रदान करेगा। उन्होंने जोर दिया कि किसानों को कच्चा माल बेचने के बजाय उसे प्रोसेस करके बेचना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, यदि शहद को आकर्षक पैकेजिंग और ब्रांड नाम के साथ बाजार में उतारा जाए, तो उसकी कीमत दोगुनी तक बढ़ सकती है।
बैठक में ई-नाम (e-NAM) और ऑनलाइन प्लेटफार्मों के माध्यम से उत्पादों को बेचने की सलाह भी दी गई। सहकारिता विभाग की ओर से नेहा जोशी ने कहा कि एफपीओ को एक व्यापारिक इकाई के रूप में काम करना होगा, जिसमें महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आम आदमी और किसानों पर प्रभाव
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि छोटे और सीमांत किसानों को बड़े बाजार तक पहुंच मिलेगी। अब तक किसान अपने उत्पादों को स्थानीय बाजारों में औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर थे, लेकिन एफपीओ के गठन के बाद वे सामूहिक रूप से अपनी शर्तों पर सौदेबाजी कर सकेंगे।
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आय में वृद्धि: वैज्ञानिक विधि और प्रोसेसिंग से उत्पादों की कीमत बढ़ेगी।
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रोजगार के अवसर: प्रोसेसिंग यूनिट और पैकेजिंग केंद्रों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर युवाओं को काम मिलेगा।
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बाजार की समझ: विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से किसान बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करना सीखेंगे।
निष्कर्ष: जनहित का नजरिया
अल्मोड़ा में शुरू हुई यह मुहिम केवल एक सरकारी बैठक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कायाकल्प का एक ब्लूप्रिंट है। जब किसान संगठित होकर काम करता है, तो उसकी लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है। वैज्ञानिक मौन पालन जैसे उद्यम न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि कम लागत में अधिक लाभ देने वाले भी हैं। यदि यह एफपीओ अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करता है, तो यह आने वाले समय में उत्तराखंड के अन्य जनपदों के लिए एक मॉडल के रूप में उभरेगा।