अंकिता को न्याय के लिए सड़कों पर उतरा उत्तराखंड, देहरादून में उग्र जनआक्रोश

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देहरादून-अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग को लेकर उत्तराखंड में जनाक्रोश एक बार फिर सड़कों पर फूट पड़ा। राजधानी देहरादून में हुए इस बड़े प्रदर्शन में हजारों लोग शामिल हुए। स्नैप में सामने आई जानकारी के अनुसार, इस आंदोलन में 102 से अधिक सामाजिक संगठनों, छात्र संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि जब तक पीड़िता को न्याय नहीं मिलता, तब तक आंदोलन थमने वाला नहीं है।

प्रदर्शन के दौरान देहरादून की कई प्रमुख सड़कों पर हालात तनावपूर्ण हो गए। पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के मद्देनज़र कई स्तरों पर बैरिकेडिंग की और सीएम आवास की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। बावजूद इसके, भीड़ का दबाव इतना ज्यादा था कि कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई।

20 से अधिक संगठनों ने दिया आंदोलन को समर्थन

स्नैप में यह भी सामने आया कि इस आंदोलन को 20 से अधिक सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का खुला समर्थन मिला। महिला संगठनों की भागीदारी खास तौर पर देखने को मिली। महिलाओं ने नारे लगाते हुए कहा कि अंकिता भंडारी मामला केवल एक हत्या का नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की गंभीर परीक्षा है।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि अब तक की कार्रवाई से जनता संतुष्ट नहीं है और मामले में पारदर्शिता की कमी महसूस की जा रही है। इसी कारण यह आंदोलन धीरे-धीरे एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले रहा है।

24 सितंबर 2022 से जुड़ा दर्द आज भी ताजा

प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने 24 सितंबर 2022 की उस घटना को याद किया, जब अंकिता भंडारी का शव बरामद हुआ था। वक्ताओं का कहना था कि इतने समय बाद भी पीड़ित परिवार न्याय की राह देख रहा है, जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लोगों ने मांग की कि मामले की सुनवाई में तेजी लाई जाए और दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा दी जाए।

पुलिस के साथ हुई तीखी नोकझोंक

स्नैप के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान हालात उस समय और बिगड़ गए जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस को सुरक्षा घेरा बनाना पड़ा। भीड़ में से कुछ लोगों द्वारा पुलिस कर्मियों पर हेलमेट और अन्य वस्तुएं फेंके जाने की घटनाएं भी सामने आईं। इसके जवाब में पुलिस ने संयम बरतते हुए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की और किसी बड़े टकराव को टाल लिया।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और किसी भी स्थिति में हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती। वहीं प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है।

महिला सुरक्षा और नीतियों पर सवाल

इस आंदोलन के दौरान गलत नीतियों और प्रशासनिक लापरवाही के आरोप भी लगे। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बनाए गए कानून और योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। जमीनी स्तर पर हालात अलग हैं, जिसका उदाहरण अंकिता भंडारी मामला है।

आगे और तेज हो सकता है आंदोलन

प्रदर्शनकारियों ने साफ संकेत दिए कि अगर उनकी मांगों पर जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आंदोलन और व्यापक किया जाएगा। उत्तराखंड बंद, जिला मुख्यालयों पर धरना और बड़े स्तर पर प्रदर्शन की रणनीति पर भी विचार किया जा रहा है।

कुल मिलाकर, देहरादून में हुआ यह प्रदर्शन यह दर्शाता है कि अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग अब केवल एक मुद्दा नहीं, बल्कि जनभावना और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुकी है। सरकार और प्रशासन के अगले कदम पर पूरे प्रदेश की नजर टिकी हुई है।

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