नंदा राजजात यात्रा 2026 स्थगित, अब अगले साल कैलाश के लिए विदा होंगी मां नंदा

Nandarajjat
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चमोली-उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में मां नंदा को बेटी की तरह पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार, हर 12 साल में नंदा राजजात यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें मां नंदा को उनके मायके (नौटी/कुरुड़) से ससुराल (कैलाश) विदा किया जाता है। पिछली राजजात वर्ष 2014 में हुई थी, जिसके अनुसार अगली यात्रा 2026 में होनी प्रस्तावित थी।

हालांकि, ज्योतिषीय गणनाओं और विद्वानों के विचार-विमर्श के बाद राजकुंवर डॉ. राकेश कुंवर ने घोषणा की है कि मुख्य ‘राजजात’ अब 2027 में आयोजित होगी। इसके पीछे का मुख्य कारण तिथियों का उचित मिलान और यात्रा मार्ग की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना है। दूसरी ओर, कुरुड़ के नंदादेवी सिद्ध पीठ मंदिर में वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर ‘बड़ी जात’ की तिथि घोषित कर दी गई है। यह यात्रा 5 सितंबर 2026 से शुरू होकर 23 सितंबर 2026 तक चलेगी।

मौसम और भौगोलिक परिस्थितियाँ बनीं मुख्य आधार

इस यात्रा को आगे बढ़ाने और तिथियों के चयन में हिमालय के कठिन भूगोल और मौसम ने बड़ी भूमिका निभाई है। सितंबर माह में उच्च हिमालयी क्षेत्रों, जैसे ज्यूंरागली, रूपकुंड, शिलासमुद्र और होमकुंड में कड़ाके की ठंड और भारी बर्फबारी की संभावना रहती है। पूर्व के अनुभवों को देखते हुए, समिति ने निर्णय लिया कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और यात्रा की सुगमता सर्वोपरि है।

राजजात समिति ने 18 जनवरी को हुई बैठक में स्पष्ट किया था कि 2026 की राजजात को स्थगित कर 2027 में करना अधिक तर्कसंगत है। इससे सरकार को भी यात्रा मार्ग की बुनियादी सुविधाओं, जैसे रास्तों की मरम्मत, पेयजल व्यवस्था और विश्राम स्थलों के निर्माण के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा।

आम जनमानस और श्रद्धालुओं पर प्रभाव

नंदा राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि चमोली और पूरे उत्तराखंड की आर्थिकी और पर्यटन का बड़ा आधार है। यात्रा की तिथि स्पष्ट होने से स्थानीय व्यापारियों, होमस्टे संचालकों और गाइडों को अपनी तैयारियों के लिए समय मिल गया है। देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए अब अपनी यात्रा की योजना बनाना आसान होगा।

बड़ी जात 2026 और राजजात 2027 के बीच का अंतर लोगों को दो चरणों में मां नंदा के दर्शन और सेवा का अवसर देगा। कुरुड़ मंदिर के पुजारियों और मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखबीर सिंह रौतेला ने बताया कि वसंत पंचमी पर पंचांग पूजन के बाद ही इन पवित्र तिथियों का निर्धारण किया गया है, जो श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूती देता है।

बुनियादी ढांचा और सरकार की भूमिका

प्रशासन के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण दोनों है। 2026 तक यात्रा से संबंधित सभी ढांचागत सुविधाओं को पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है। नौटी गांव से लेकर होमकुंड तक के लगभग 280 किलोमीटर के पैदल मार्ग को सुव्यवस्थित करना एक बड़ा कार्य है। सरकार की योजना है कि इस समय का सदुपयोग कर रास्तों को सुरक्षित बनाया जाए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की आपदा या दुर्घटना से बचा जा सके।

निष्कर्ष: आस्था और सुरक्षा का समन्वय

नंदा राजजात यात्रा का 2027 में जाना और 2026 में बड़ी जात का आयोजन होना, आस्था और व्यवहारिकता के बीच एक संतुलन को दर्शाता है। नौवीं शताब्दी से चली आ रही यह परंपरा देवभूमि की आत्मा है। तिथियों की इस स्पष्टता से न केवल भ्रम दूर हुआ है, बल्कि यह सुनिश्चित हुआ है कि जब श्रद्धालु हिमालय की दुर्गम चोटियों पर मां नंदा की डोली के पीछे चलेंगे, तो उनके पास बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित मार्ग होगा।

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