रजत जयंती उत्तराखंड विशेष- पहाड़ के गिर्दा!

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जनगीतों का स्वर – गिर्दा की पहचान

(उत्तराखंड राज्य आंदोलन के जनकवि पर विशेषांक)

🌱 जीवन और संघर्ष का आरंभ

उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना और जनसंघर्षों का नाम लेते ही जिस व्यक्तित्व की छवि सबसे पहले उभरती है, वह है गिरीश चन्द्र तिवारी ‘गिर्दा’। 10 सितम्बर 1945 को अल्मोड़ा ज़िले के ज्योली गाँव में जन्मे गिर्दा ने बचपन से ही साहित्य और कला में रुचि दिखाई। पिता हंसा दत्त तिवारी और माता जीवन्ती देवी के संस्कारों ने उन्हें संवेदनशील बनाया। पहाड़ की कठिन जीवन परिस्थितियों ने उनके भीतर जनमानस की पीड़ा को समझने और उसे अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित की।

🎭 लखनऊ से पहाड़ तक का सफर

युवा अवस्था में गिर्दा रोजगार की तलाश में पीलीभीत, अलीगढ़ और लखनऊ तक गए। लखनऊ में बिजली विभाग और लोक निर्माण विभाग में नौकरी करने के बाद 1967 में उन्हें गीत एवं नाटक विभाग में स्थायी नियुक्ति मिली। यही वह मोड़ था जिसने गिर्दा को कला और साहित्य की दुनिया में गहराई से प्रवेश कराया। आकाशवाणी लखनऊ के संपर्क ने उन्हें शेरदा अनपढ़, केशव अनुरागी, उर्मिल कुमार थपलियाल और घनश्याम सैलानी जैसे रचनाकारों से जोड़ा। इन साहित्यकारों और कलाकारों के सानिध्य ने गिर्दा की प्रतिभा को निखारा।

📚 शिखरों के स्वर और साहित्यिक पहचान

1968 में दुर्गेश पंत के साथ प्रकाशित ‘शिखरों के स्वर’ कुमाउंनी कविता संग्रह ने गिर्दा को साहित्यिक जगत में स्थापित किया। इस संग्रह ने पहाड़ की संवेदनाओं को शब्द दिया और गिर्दा को जनकवि के रूप में पहचान दिलाई। 2009 में इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ, जो इस बात का प्रमाण है कि गिर्दा की रचनाएँ समय के साथ और भी प्रासंगिक होती गईं।

✊ कविता और नाटक: संघर्ष का औज़ार

गिर्दा ने कविताओं और गीतों को केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं माना, बल्कि उन्हें संघर्ष का औज़ार बनाया। उन्होंने अंधायुग, अंधर नगरी चौनपट राजा, नगाड़े खामोश हैं और धनुष यज्ञ जैसे नाटकों का निर्देशन किया। इन प्रस्तुतियों में सामाजिक अन्याय और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार था।

उनकी कविताएँ और गीत सीधे जनता के दिल से जुड़े। “आज हिमाल तुमन कैं धत्युछ, जागौ-जागौ हो मेरा लाल” जैसी पंक्तियाँ चिपको आंदोलन में युवाओं के लिए ऊर्जा का स्रोत बनीं। गिर्दा ने यह साबित किया कि कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जनसंघर्षों की मशाल भी हो सकती है।

🌲 चिपको से राज्य आंदोलन तक गूँजती आवाज़

1974 के चिपको आंदोलन में गिर्दा की कविताएँ जंगल बचाने की लड़ाई का स्वर बनीं। 1977 के वन बचाओ आंदोलन, 1984 के नशा नहीं-रोजगार दो आंदोलन और 1994 के उत्तराखंड राज्य आंदोलन में गिर्दा हर जगह मौजूद रहे। उनके गीतों ने जनता को एकजुट किया और आंदोलन को दिशा दी।

गिर्दा ने राजनीति के ठेकेदारों पर सीधा वार किया और जनता को अपने हक़-हकूक के लिए लड़ने की प्रेरणा दी। वे केवल कवि नहीं थे, बल्कि आंदोलनों के पर्याय बन गए।

🎶 आंदोलन की आत्मा बने गिर्दा के स्वर

1994 के राज्य आंदोलन में जब उत्तराखंड की जनता सड़कों पर थी, तब गिर्दा के गीत आंदोलन की आत्मा बन गए थे। नैनीताल, हल्द्वानी, देहरादून से लेकर दिल्ली तक उनके स्वर गूंजते रहे।

उनके गीतों ने आंदोलनकारियों को एकजुट किया और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि उनका संघर्ष न्यायपूर्ण है। “उत्तराखंड मेरी जन्मभूमि तेरी जैजैकारा…” जैसे गीतों ने आंदोलन को सांस्कृतिक पहचान दी।

🛡️ राज्य निर्माण की पुकार में गूंजते गीत

गिर्दा ने अपने गीतों में राज्य निर्माण की पुकार को इस तरह पिरोया कि वह हर पहाड़ी दिल की आवाज़ बन गई। “ओ जैंता एक दिन तो आलो यो दिन यो दुनि मां…” जैसी पंक्तियाँ आंदोलन की आशा और संकल्प का प्रतीक बन गईं।

उनके गीतों में केवल विरोध नहीं था, बल्कि एक सकारात्मक दृष्टि थी—एक नए उत्तराखंड की कल्पना, जिसमें न्याय, समानता और सांस्कृतिक गरिमा हो।

🎶 जनगीतों से जागी जनता की ताक़त

नैनीताल के आंदोलन में गिर्दा ने गाया—

ये गीत केवल शब्द नहीं थे, बल्कि संघर्ष की मशाल थे। उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि परिवर्तन संभव है और उसके लिए संघर्ष करना आवश्यक है।

🌟 सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी

गिर्दा ने लोकनाट्य और जननाट्य को बढ़ावा दिया। वे आम जनता की आवाज़ बने और उनकी रचनाएँ आज भी सत्ता को चुनौती देती हैं। उन्होंने पहाड़ की बोली, संस्कृति और परंपराओं को गीतों और कविताओं में जीवित रखा।

गिर्दा का योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं था। वे सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे और हर संघर्ष में जनता के साथ खड़े हुए। उनकी रचनाएँ आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं और समाज को जागरूक करती हैं।

🕊️ गिर्दा की विरासत और आज का संदर्भ

22 अगस्त 2010 को गिर्दा की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई। लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी जीवित हैं। “जैंता एक दिन तो आलु, दिन ए दुनि में” जैसे गीत आज भी पहाड़ी जनमानस को सतत संघर्ष का संकल्प देते हैं।

गिर्दा का जाना उत्तराखंड के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में एक शून्य छोड़ गया है, जिसकी भरपाई असंभव है। लेकिन उनकी कविताएँ और जनगीत आज भी हमें याद दिलाते हैं कि जनकवि केवल शब्दों का शिल्पी नहीं होता, वह जनता की आत्मा का स्वर होता है।

✨ निष्कर्ष

गिर्दा की रचनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि साहित्य और कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का औज़ार हैं। राजत जयंती पर गिर्दा को याद करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस संकल्प को दोहराना है जो उन्होंने अपने गीतों और कविताओं में दिया था—जनता के हक़-हकूक के लिए संघर्ष करना और समाज को जागरूक करना।

गिर्दा की विरासत हमें यह प्रेरणा देती है कि हम भी अपने समय के अन्याय और विसंगतियों के खिलाफ आवाज़ उठाएँ। उनकी कविताएँ और गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके जीवनकाल में थे।

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