
बेंगलुरु – बैंक खातों से जुड़ी शिकायतों को लेकर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम और राहत भरा फैसला सुनाया है। आयोग ने साफ कहा है कि यदि किसी ग्राहक की कोई गलती नहीं है और उसके बैंक खाते से गलत तरीके से या बिना अनुमति के पैसे निकल जाते हैं, तो बैंक को वह राशि 10 दिनों के भीतर ग्राहक को वापस करनी होगी। यह फैसला देशभर के लाखों बैंक ग्राहकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामला एक सेवानिवृत्त खाताधारक से जुड़ा है, जिसके खाते से ओटीपी के जरिए बड़ी रकम निकाल ली गई। ग्राहक का कहना था कि उसने न तो कोई लेनदेन किया और न ही किसी को अपनी बैंकिंग जानकारी या ओटीपी साझा की। इसके बावजूद उसके खाते से कुल 9 लाख 52 हजार रुपये निकल गए। जब ग्राहक को इसकी जानकारी मिली तो उसने तुरंत बैंक को सूचना दी और शिकायत दर्ज कराई।
बैंक की ओर से शुरुआत में इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया। ग्राहक को संतोषजनक जवाब नहीं मिला और रकम भी वापस नहीं की गई। परेशान होकर खाताधारक ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के बाद जिला आयोग ने बैंक को दोषी ठहराया और ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया।
बैंक ने इस फैसले को राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी, लेकिन वहां भी बैंक को राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग तक पहुंचा। आयोग ने सभी तथ्यों और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक बैंक यह साबित नहीं कर देता कि निकासी में ग्राहक की गलती या लापरवाही थी, तब तक जिम्मेदारी बैंक की ही मानी जाएगी।
राष्ट्रीय आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बैंकिंग सेवा उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत आती है। बैंक का दायित्व है कि वह ग्राहकों के खातों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। यदि बैंकिंग सिस्टम में तकनीकी खामी, सुरक्षा में कमी या आंतरिक लापरवाही के कारण खाते से रकम निकलती है, तो उसका नुकसान ग्राहक पर नहीं डाला जा सकता।
आयोग ने यह भी कहा कि ग्राहक ने समय रहते बैंक को सूचना दी थी, इसलिए देरी या नुकसान का दोष ग्राहक पर नहीं मढ़ा जा सकता। बैंक को निर्देश दिए गए कि वह 10 कार्यदिवस के भीतर पूरी राशि ग्राहक को लौटाए। साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि यदि भविष्य में ऐसे मामलों में बैंक टालमटोल करता है, तो उस पर सख्त कार्रवाई हो सकती है।
यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि आज के समय में डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन ट्रांजैक्शन और ओटीपी आधारित लेनदेन तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में फ्रॉड, तकनीकी गड़बड़ी और साइबर ठगी के मामले भी सामने आ रहे हैं। इस निर्णय से बैंकों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय होती है और ग्राहकों का भरोसा मजबूत होता है।
उपभोक्ता विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला एक मिसाल के रूप में देखा जाएगा। इससे साफ संदेश जाता है कि बैंक अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। अगर ग्राहक की कोई गलती नहीं है तो उसे न्याय मिलना तय है।
कुल मिलाकर, उपभोक्ता आयोग का यह फैसला आम बैंक ग्राहकों के हित में है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि बिना ग्राहक की गलती के बैंक खाते से निकली रकम की भरपाई बैंक को ही करनी होगी और वह भी तय समय सीमा के भीतर। यह निर्णय बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वास को और मजबूत करेगा।
इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि बैंक केवल नियमों और शर्तों का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। यदि ग्राहक ने समय पर शिकायत दर्ज कराई है और उसकी ओर से किसी तरह की लापरवाही साबित नहीं होती, तो बैंक को पूरी जवाबदेही निभानी होगी। उपभोक्ता आयोग ने यह संदेश दिया है कि बैंकिंग व्यवस्था में ग्राहक की सुरक्षा सर्वोपरि है और किसी भी तकनीकी खामी या सिस्टम फेल होने की कीमत आम उपभोक्ता को नहीं चुकानी चाहिए।