
बागेश्वर-उत्तराखंड की देवभूमि ने एक बार फिर राष्ट्रीय पटल पर अपनी चमक बिखेरी है। बागेश्वर जिले के कांडा तहसील अंतर्गत खंतोली गांव के मूल निवासी कैलाश चंद्र पंत को केंद्र सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा के बाद पूरे क्षेत्र में जश्न का माहौल है। हालांकि कैलाश चंद्र पंत का परिवार दशकों पहले मध्य प्रदेश के महू में जाकर बस गया था, लेकिन अपनी मिट्टी और कुलदेवता के प्रति उनकी अटूट आस्था ने उन्हें हमेशा उत्तराखंड से जोड़े रखा। रविवार को जैसे ही उनके नाम की घोषणा हुई, पैतृक गांव खंतोली में ग्रामीणों ने मिठाई बांटकर और आतिशबाजी कर अपनी खुशी का इजहार किया। यह सम्मान न केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि है, बल्कि उस पहाड़ की अस्मिता का भी सम्मान है, जिसने देश को कई रत्न दिए हैं।
गौरवशाली अतीत और मध्य प्रदेश का सफर
कैलाश चंद्र पंत का जन्म 26 अप्रैल 1936 को मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित महू में हुआ था। उनके पूर्वज मूल रूप से बागेश्वर के खंतोली (तल्ला गांव) के रहने वाले थे। उनके दादा के समय में ही परिवार के तीन भाई मध्य प्रदेश की ओर पलायन कर गए थे और वहीं बस गए। कैलाश चंद्र पंत का पूरा परिवार उनके जन्म से पहले ही गांव छोड़ चुका था, लेकिन घर में पहाड़ की संस्कृति और संस्कारों को हमेशा जीवित रखा गया। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में रहने के बावजूद कैलाश चंद्र पंत और उनके परिजनों का लगाव अपनी जड़ों से कभी कम नहीं हुआ।
धौलीनाग मंदिर में गहरी आस्था
खंतोली गांव के ग्रामीण बताते हैं कि कैलाश चंद्र पंत का अपनी कुल भूमि और देवताओं के प्रति अगाध प्रेम है। वह समय-समय पर अपने परिवार के साथ गांव आते रहे हैं। वर्ष 2006 में वह अंतिम बार अपनी जड़ों की ओर लौटे थे, तब उन्होंने धौलीनाग मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की थी। भगवान धवलनाग में उनकी गहरी आस्था है। ग्रामीणों के अनुसार, बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से पिछले कुछ वर्षों से उनका गांव आना कम हो गया, लेकिन वह फोन और अन्य माध्यमों से हमेशा गांव के हाल-चाल लेते रहते हैं। उनकी पुत्री प्रीति जोशी भी अपने पैतृक गांव की यादों को संजोए रखती हैं।
गांव में जश्न और बिरादरी की खुशी
जैसे ही पद्मश्री सम्मान की खबर खंतोली पहुंची, रविवार शाम को गांव के चौक पर लोग जमा होने लगे। स्थानीय निवासी दामोदर पंत, चंद्रप्रकाश पंत, और मोहन पंत ने बताया कि यह हमारे पूरे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है कि हमारे गांव का एक बेटा आज देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक प्राप्त कर रहा है। इस मौके पर संध्या पंत, गिरीश पंत, विनोद पंत, महेश पंत, प्रभाकर पंत, सुशीला पंत और भगवती पंत सहित भारी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। ग्रामीणों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया और इसे गांव के इतिहास का सबसे सुनहरा दिन बताया।
पहाड़ से पलायन और सफलता का संदेश
कैलाश चंद्र पंत की यह उपलब्धि उन लाखों प्रवासियों के लिए एक प्रेरणा है जो रोजगार या अन्य कारणों से पहाड़ से दूर चले गए हैं। यह कहानी दर्शाती है कि भौतिक रूप से दूर होने के बावजूद यदि मन में अपनी संस्कृति और गांव के प्रति प्रेम हो, तो व्यक्ति कहीं भी रहकर अपनी पहचान को अक्षुण्ण रख सकता है। उनकी सफलता ने यह साबित किया है कि प्रतिभा किसी भूगोल की मोहताज नहीं होती, लेकिन अपनी जड़ों का आशीर्वाद व्यक्ति को शिखर तक ले जाने में सहायक होता है।
सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभाव
पद्मश्री जैसा सम्मान मिलने से स्थानीय युवाओं में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। कांडा और बागेश्वर के सीमावर्ती गांवों में इस बात की चर्चा है कि कैसे एक छोटे से गांव से निकला परिवार देश के प्रतिष्ठित पद तक पहुंच सकता है। इस खबर का असर केवल खंतोली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जनपद में इसे एक सांस्कृतिक और बौद्धिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। आम आदमी के नजरिए से देखें तो ऐसी खबरें दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा और समर्पण के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करती हैं।
निष्कर्ष: जनहित और सांस्कृतिक गौरव
कैलाश चंद्र पंत को मिला यह सम्मान उत्तराखंड की उस प्रतिभा का प्रमाण है जो देश के कोने-कोने में अपनी सेवा दे रही है। खंतोली गांव में मना यह जश्न बताता है कि पहाड़ के लोग आज भी अपने उन भाइयों को नहीं भूले हैं जो दूर शहरों में जाकर बस गए हैं। यह सम्मान पहाड़ के गौरव को बढ़ाता है और आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहकर मेहनत करने का संदेश देता है।