भारत रत्न देने में देरी पर संघ प्रमुख ने उठाए सवाल, सावरकर के योगदान को बताया अतुलनीय

Savarkar
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मुंबई में रविवार को आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में आरएसएस के शताब्दी वर्ष के सफर और भविष्य के लक्ष्यों पर चर्चा की गई। इसी दौरान सावरकर को भारत रत्न दिए जाने का मुद्दा उठा, जो लंबे समय से भारतीय राजनीति में चर्चा और विवाद का विषय रहा है। मोहन भागवत ने इस मुद्दे पर हो रही देरी पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यद्यपि वे उस समिति का हिस्सा नहीं हैं जो यह निर्णय लेती है, लेकिन वे अवसर मिलने पर संबंधित अधिकारियों से इस देरी का कारण जरूर पूछेंगे।

उल्लेखनीय है कि भाजपा और शिवसेना जैसे दल लंबे समय से सावरकर को देश का सर्वोच्च सम्मान देने की मांग करते रहे हैं, जबकि कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनकी भूमिका और ब्रिटिश सरकार को दी गई याचिकाओं का हवाला देकर इसका विरोध करते रहे हैं। भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब संघ अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जड़ों को और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

कारण और परिस्थितियाँ

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में सावरकर को केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक महान विचारक और समाज सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, सावरकर के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और उन्होंने देश की अखंडता के लिए जो त्याग किया, उसे किसी भी सम्मान की परिधि में नहीं बांधा जा सकता।

साथ ही, भागवत ने संघ की कार्यप्रणाली पर भी महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने ‘प्रचार’ की तुलना वर्षा से करते हुए कहा कि यह सीमित और समय पर होना चाहिए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी कि अत्यधिक प्रचार से अहंकार जन्म ले सकता है, जो संगठन के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। संघ का उद्देश्य समाज में संस्कारों का निर्माण करना है, न कि आक्रामक अभियानों के जरिए दिखावा करना।

जनता और पाठकों पर प्रभाव

सरसंघचालक के इस बयान का समाज के विभिन्न वर्गों पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है। सावरकर के अनुयायियों और हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिए यह एक भावनात्मक प्रोत्साहन है। वहीं, आम जनता के बीच यह संदेश गया है कि राष्ट्रीय सम्मानों का आधार राजनीतिक विचारधारा के बजाय राष्ट्र के प्रति किया गया ऐतिहासिक योगदान होना चाहिए। भाषा के मुद्दे पर उनके रुख ने भी पाठकों को प्रभावित किया है, जहाँ उन्होंने अंग्रेजी के प्रति कोई नफरत न रखते हुए मातृभाषा के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया है।

आगे क्या बदलेगा

मोहन भागवत के इस बयान के बाद सावरकर को भारत रत्न देने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर जोर पकड़ सकती है। आगामी चुनावों और राजनीतिक विमर्श में यह मुद्दा केंद्र में रहने की उम्मीद है। इसके अलावा, संघ द्वारा अंग्रेजी भाषा को लेकर दी गई स्पष्टता से दक्षिण और उत्तर भारत के बीच संवाद के सेतु मजबूत होंगे। संघ अब अपने संपर्क कार्यक्रमों में अधिक लचीलापन ला रहा है, जिससे इसकी पहुंच उन वर्गों तक भी बढ़ेगी जो अब तक भाषा या अन्य कारणों से दूर थे।

आम आदमी को क्या फायदा या असर

एक आम नागरिक के लिए संघ प्रमुख की बातें सामाजिक समरसता और भाषाई संतुलन का पाठ पढ़ाती हैं।

  • सांस्कृतिक गौरव: सावरकर जैसे नायकों को सम्मान मिलने से आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास पर गर्व होगा।

  • भाषा का संतुलन: मातृभाषा को प्राथमिकता देने की बात से स्थानीय भाषाओं के संरक्षण को बल मिलेगा, जबकि अंग्रेजी के प्रभावी उपयोग की सलाह युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगी।

  • संस्कार आधारित समाज: संघ की ‘प्रचार मुक्त’ कार्यशैली आम आदमी को सादगी और निस्वार्थ सेवा की ओर प्रेरित करती है।

निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल का सफर भारतीय समाज में आए बड़े बदलावों का गवाह रहा है। मोहन भागवत का वीर सावरकर के प्रति सम्मान और संगठन की कार्यशैली में भाषाई लचीलापन दिखाना यह दर्शाता है कि संघ अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक चुनौतियों के लिए भी तैयार है। सावरकर को भारत रत्न देने की बात केवल एक राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक न्याय की पुकार के रूप में देखी जा रही है। जनहित के नजरिए से, यह संवाद समाज में महापुरुषों के प्रति सम्मान और अपनी संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी के भाव को और अधिक गहरा करेगा।

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