
नई दिल्ली। देश में लावारिस कुत्तों के हमलों और उनसे जुड़े विवादों पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि अदालत इस मामले को लेकर पूरी तरह गंभीर है और किसी भी प्रकार की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने संकेत दिए हैं कि वे लावारिस कुत्तों को खाना खिलाने वाले व्यक्तियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में विचार कर रहे हैं।
व्यंग्य नहीं, गंभीरता से लें टिप्पणी: कोर्ट
सुनवाई के दौरान जब अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पिछली सुनवाई की कुछ टिप्पणियों को ‘व्यंग्य’ के रूप में देखे जाने का जिक्र किया, तो पीठ ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि उनकी पिछली टिप्पणियां कोई मजाक नहीं थीं, बल्कि बहुत गंभीरता के साथ कही गई थीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लावारिस कुत्तों को खाना खिलाने वालों को उन कुत्तों के व्यवहार और उनसे होने वाली सार्वजनिक समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
मेनका गांधी के बयान पर नाराजगी और अवमानना का जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी के एक हालिया बयान पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि लावारिस कुत्तों के मुद्दों पर शीर्ष अदालत के आदेशों की आलोचना करना ‘अदालत की अवमानना’ की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने यहां तक कहा कि “मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब ने भी अदालत की अवमानना नहीं की थी, लेकिन आपने (मेनका गांधी) की है”। हालांकि, अदालत ने अपनी उदारता का हवाला देते हुए फिलहाल उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं की है।
मीडिया रिपोर्टिंग और सार्वजनिक सुरक्षा
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि लावारिस कुत्तों को खाना खिलाने वालों को परेशान किया जा रहा है, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि वे इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले रहे हैं। पीठ ने कहा कि हमें अभी यह तय करना है कि आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, लेकिन यह निश्चित है कि सार्वजनिक सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो आवासीय सोसायटियों और सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं। यदि जवाबदेही तय होती है, तो कुत्ते द्वारा किसी व्यक्ति को काटे जाने या चोट पहुंचाने की स्थिति में खाना खिलाने वाले व्यक्ति पर कानूनी गाज गिर सकती है। यह निर्णय शहरी क्षेत्रों में कुत्तों के आतंक से परेशान नागरिकों के लिए राहत की खबर हो सकता है, जबकि पशु प्रेमियों के लिए यह नए नियमों की चुनौती पेश करेगा।
पशु प्रेम और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच कानूनी द्वंद्व
अदालत की इन टिप्पणियों का दूरगामी प्रभाव उन स्थानीय समुदायों और आवासीय सोसायटियों पर पड़ेगा जहाँ अक्सर कुत्तों को खाना खिलाने वाले स्वयंसेवकों और आम निवासियों के बीच विवाद की स्थिति बनी रहती है। जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत शौक या जानवरों के प्रति दया भाव दूसरों के सुरक्षित आवाजाही के अधिकार का हनन नहीं कर सकता। यदि भविष्य में कोर्ट इस संबंध में कड़े दिशा-निर्देश जारी करता है, तो यह स्थानीय नगर निकायों के लिए भी एक नजीर बनेगा, जिन्हें अब तक आवारा कुत्तों के आतंक को नियंत्रित करने में विफल माना जाता रहा है। यह मामला अब केवल पशु क्रूरता बनाम सुरक्षा का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर कानूनी जवाबदेही और सार्वजनिक व्यवस्था के अनुपालन का बन गया है।
निष्कर्ष: जनहित और कानून का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सामाजिक व्यवस्था और व्यक्तिगत शौक के बीच एक रेखा खींचने की कोशिश है। जानवरों को खाना खिलाना मानवीय संवेदना हो सकती है, लेकिन इसके कारण दूसरों की सुरक्षा खतरे में नहीं पड़नी चाहिए। आने वाले समय में कोर्ट इस पर क्या विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करता है, इस पर पूरे देश की नजर रहेगी।