
बागेश्वर-कुमाऊँ की लोकसंस्कृति में कई ऐसे लोकगीत हैं, जिनकी जड़ें किसी कल्पनालोक में नहीं, बल्कि आम जीवन की सच्ची घटनाओं में मिलती हैं। छाना बिलौरी ऐसा ही एक लोकगीत है, जो आज कुमाऊँ की पहचान बन चुका है। यह गीत न केवल एक सांगीतिक रचना है, बल्कि बागेश्वर जनपद के एक छोटे से गाँव, उसकी भौगोलिक स्थिति और वहां घटी एक घरेलू घटना की जीवंत स्मृति भी है।
छाना बिलौरी गाँव का स्थान और भौगोलिक स्थिति
छाना बिलौरी गाँव बागेश्वर जनपद में अल्मोड़ा–बागेश्वर मार्ग पर स्थित है। यह झिरोली मैग्नेसाइट क्षेत्र से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। काफलीगैर बाजार से भी यह गाँव लगभग एक किलोमीटर दूर है।
यह गाँव घाटी के बीच एक उभरे हुए टीले पर बसा हुआ है। इसकी भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यहां दिन के समय धूप सीधी और तीखी पड़ती है। ऊँचाई और खुलेपन के कारण गर्मियों में यहां का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक महसूस होता है। यही कारण है कि यह गाँव लंबे समय से “घाम” यानी तेज धूप के लिए जाना जाता रहा है।
लोकगीत के पीछे की वास्तविक घटना
जनवरी 2015 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, गाँव के बुजुर्गों ने छाना बिलौरी लोकगीत की पृष्ठभूमि को साझा किया था। गांव के 83 वर्षीय हयात सिंह रौतेला और 81 वर्षीय रतन सिंह रौतेला बताते हैं कि लगभग 75 वर्ष पहले कांडा क्षेत्र के अपेक्षाकृत ठंडे इलाके से एक युवती का विवाह छाना बिलौरी गाँव में हुआ था। कांडा की ठंडक की तुलना में छाना बिलौरी का मौसम कहीं अधिक गर्म था, जो उस युवती के लिए नया और कठिन अनुभव साबित हुआ।
विवाह के बाद ससुराल में पारिवारिक तालमेल भी सहज नहीं रहा। घरेलू मतभेद और वातावरण की गर्मी दोनों ने मिलकर तनाव को बढ़ा दिया। एक दिन यह तनातनी इस हद तक पहुंच गई कि युवती मायके चली गई। मायके पहुंचकर उसने साफ कहा कि छाना बिलौरी में पड़ने वाली तेज धूप उसे बीमार कर देती है और वह अब ससुराल वापस नहीं जाएगी। इसके बाद वह दोबारा उस गाँव नहीं लौटी।
घटना से लोकगीत बनने तक
यह घटना उस समय केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रही। गांव के बाहर के किसी व्यक्ति ने इस महिला के ससुराल न लौटने और धूप को कारण बताने की बात को गीत का रूप दे दिया। धीरे-धीरे यह गीत गांवों में गाया जाने लगा और छाना बिलौरी गाँव की पहचान “घाम” से स्थायी रूप से जुड़ गई। एक व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक स्मृति में ढलकर लोकगीत बन गया।
लोकगीत की लोकप्रियता कैसे फैली
छाना बिलौरी लोकगीत मौखिक परंपरा से विकसित हुआ है, इसलिए इसके सबसे पहले गाए जाने का कोई लिखित या निश्चित प्रमाण नहीं मिलता। हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इस लोकगीत को रेडियो पर पहली बार कुमाऊँनी लोकगायिका बीना तिवारी ने गाया। रेडियो प्रसारण के माध्यम से यह गीत कुमाऊँ के दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंचा और लोगों की जुबान पर चढ़ गया।
इसके बाद बांसुरी वादक प्रताप सिंह और लोकगायक मोहन सिंह रीठागाड़ी द्वारा गाए जाने पर यह लोकगीत मंचों और सांस्कृतिक आयोजनों में बेहद लोकप्रिय हो गया। लोकमहोत्सवों और पारंपरिक कार्यक्रमों में यह गीत कुमाऊँनी लोकसंस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बन गया।
समाज पर पड़ा लोकगीत का प्रभाव
छाना बिलौरी लोकगीत का प्रभाव केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा। धीरे-धीरे यह गीत सामाजिक बातचीत और धारणाओं का हिस्सा बन गया। हालात ऐसे बने कि लोग अपनी बेटियों का विवाह तय करने से पहले छाना बिलौरी गाँव के लोगों से वहां की धूप और गर्मी को लेकर सवाल पूछने लगे। एक लोकगीत ने इस तरह सामाजिक सोच और व्यवहार को भी प्रभावित किया।
इस लोकप्रभाव को देखते हुए प्रसिद्ध लोकगायक गोपालबाबू गोस्वामी ने भी छाना बिलौरी से जुड़ी भावना को आधार बनाकर एक गीत की रचना की, जिसकी शुरुआती पंक्तियाँ लंबे समय तक कुमाऊँ में गुनगुनाई जाती रहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि छाना बिलौरी केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संदर्भ बन चुका था।
लोकसंस्कृति में छाना बिलौरी का महत्व
छाना बिलौरी लोकगीत यह दर्शाता है कि लोकसाहित्य किसी बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम का मोहताज नहीं होता। कभी-कभी एक साधारण घरेलू घटना, गांव का भूगोल और समाज की सामूहिक प्रतिक्रिया मिलकर ऐसी रचना को जन्म दे देती है, जो पीढ़ियों तक जीवित रहती है।
निष्कर्ष
छाना बिलौरी बागेश्वर के एक छोटे से गाँव की सच्ची कहानी से निकला वह लोकगीत है, जिसने पूरे कुमाऊँ में अपनी अलग पहचान बनाई। इसकी ताकत इसकी सच्चाई, स्थानीय अनुभव और मानवीय संवेदनाओं में छिपी है। यही कारण है कि छाना बिलौरी आज भी कुमाऊँ की लोकस्मृति में उतनी ही जीवंत है, जितनी दशकों पहले थी।