
बूढ़ी दीपावली इगास‑बग्वाल
बूढ़ी दीपावली (इगास‑बग्वाल) 2025 आज, 1 नवम्बर को पहाड़ी इलाकों में धूमधाम से मनाई जा रही है। इस लोकपर्व में गांवों के चौकों और मंदिरों पर दीये जगमगाए, मशालें जलीं और लोकधुनों पर सामूहिक नृत्य‑गान से रात जीवंत हो उठी है।
कहाँ और कब मनाई जा रही है
- प्रमुख क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और कुल्लू (निरमंड) तथा उत्तराखंड के ग्रामीण पहाड़ी इलाके।
- तिथि: 1 नवम्बर 2025 (कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष एकादशी पर प्रचलित क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार)।
- आयोजन समय: शाम से रात तक; मुख्य गतिविधियाँ शाम ढलते ही शुरू होकर देर रात तक चलती हैं।
उत्सव की मुख्य रस्में और दृश्य
- टॉर्च‑नृत्य (भैलो): युवाओं के समूह चीड की टहनियों से बनी मशालें लेकर ढोल‑दमाऊं की ताल पर नाचते हैं।
- तुलसी‑चौरा और दीये: गाँव के तुलसी चौरे और घरों के आँगन में मिट्टी के दीयों की पंक्तियाँ सजाईं जाती हैं।
- मन्दिर‑उज्जवलन: छोटे मंदिरों के प्रांगण तेल‑दीपों से रोशन होते हैं और सामूहिक पूजा‑अर्चना होती है।
- विशेष व्यंजन: पारंपरिक व्यंजन जैसे आरसे और पूए बाँटे और मिलकर खाए जाते हैं।
क्यों 11 दिन बाद मनाया जाता है
लोककथाओं और क्षेत्रीय समझ के अनुसार अयोध्या से दिवाली की खुशखबर दूर के पहाड़ी इलाकों तक 11 दिन में पहुँची थी; इसी कारण कुछ स्थानों पर यह उत्सव दिवाली के 11 दिन बाद यानी एकादशी को मनाया जाता है। कुछ क्षेत्रों में प्रसार‑विलंब के कारण समारोह और भी बाद में आयोजित होते हैं।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्त्व
बूढ़ी दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं है; यह सामुदायिक एकता, पीढ़ीगत स्मृति और लोकसंस्कृति का जीता जागता प्रतीक है। पर्व ग्रामीण पहाड़ी जीवन के त्योहारों, लोकगीतों और पारंपरिक वेशभूषा को बरकरार रखता है और युवा‑पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है।
सुरक्षा और पारिस्थितिक सुझाव
- मशालों और दीयों के पास बच्चों की निगरानी आवश्यक है।
- मिट्टी के दीये और कागज़‑आधारित सजावट को प्राथमिकता दें; प्लास्टिक‑आधारित वस्तुएँ सीमित रखें।
- सामुदायिक‑प्रबंधित नृत्य‑प्रदर्शन और मार्ग की स्पष्टता से भीड़ नियंत्रण बेहतर रहता है।
बूढ़ी दीपावली इगास‑बग्वाल इस साल भी पहाड़ों में परंपरा की लौ और समुदाय के उल्लास का प्रतीक बनी है — रात भर के उजालों में गाँवों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान फिर से जीवित की।