कुमाऊँ में आज से होली का आगाज़: शास्त्रीय रागों में गूंजेगी बैठकी होली, पौष माह के प्रथम रविवार से परंपरा शुरू

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अल्मोड़ा/नैनीताल-कुमाऊँ अंचल में आज से पारंपरिक कुमाऊँनी होली का विधिवत शुभारंभ हो गया है। पौष माह के प्रथम रविवार से शुरू होने वाली यह होली देश की अनोखी लोक–सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है, जो पूरी तरह शास्त्रीय संगीत आधारित रागों पर गाई जाती है। यही वजह है कि कुमाऊँ की होली को केवल उत्सव नहीं, बल्कि संगीत और साधना का पर्व माना जाता है।

बैठकी होली से होती है शुरुआत

कुमाऊँनी होली की शुरुआत बैठकी होली से होती है। इसमें होल्यार (होली गाने वाले लोग) एक स्थान पर बैठकर राग–रागनियों में होली गायन करते हैं। इन गीतों में भक्ति, श्रृंगार और सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती है।
बैठकी होली में मुख्य रूप से राग खमाज, यमन, काफी, भैरव और जयजयवंती जैसे शास्त्रीय रागों का प्रयोग होता है।

पौष से रंग पंचमी तक चलता है उत्सव

परंपरा के अनुसार पौष माह से शुरू हुई होली फाल्गुन में अपने चरम पर पहुंचती है और रंग पंचमी तक चलती है। माघ और फाल्गुन माह में बैठकी होली के बाद खड़ी होली का दौर आता है, जिसमें होल्यार समूह बनाकर गांव–शहरों में घूमते हुए होली गाते हैं।

कृष्ण भक्ति और लोक जीवन का संगम

कुमाऊँनी होली के गीतों में भगवान कृष्ण की लीलाओं, राधा–कृष्ण प्रेम, ब्रज संस्कृति के साथ-साथ पहाड़ी जीवन, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक संदेशों का सुंदर समावेश होता है। यही कारण है कि इसे उत्तराखंड की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर भी माना जाता है।

अल्मोड़ा से नैनीताल तक गूंज

होली का यह सांस्कृतिक रंग विशेष रूप से अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर और पिथौरागढ़ में देखने को मिलता है। कई स्थानों पर होली समितियां और सांस्कृतिक संस्थाएं पारंपरिक राग–रागनियों को सहेजने का कार्य भी कर रही हैं।

स्रोतों के अनुसार

संस्कृति विभाग उत्तराखंड, लोक कलाकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार कुमाऊँनी होली की परंपरा लगभग 300 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है, जिसकी जड़ें चंद शासकों के काल से जुड़ी बताई जाती हैं। यह परंपरा आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनी हुई है।

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