
नैनीताल-उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अन्य राज्यों से विवाह कर उत्तराखंड आने वाली अनुसूचित जाति (SC) वर्ग की महिलाएं राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले आरक्षण का लाभ नहीं ले सकेंगी। अदालत ने कहा कि आरक्षण का आधार जन्म-स्थान और मूल निवास होता है, न कि विवाह के बाद प्राप्त नया निवास स्थान।
क्या कहा हाईकोर्ट ने?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
अन्य राज्य की SC महिला यदि विवाह के बाद उत्तराखंड में बस जाए, तो वह उत्तराखंड की मूल निवासी नहीं मानी जाएगी।
मूल निवासी होने का लाभ केवल उसी व्यक्ति को मिलेगा जिसका जन्म और पारिवारिक मूल उत्तराखंड में हो।
विवाह के आधार पर आरक्षण का दावा मान्य नहीं।
यह फैसला उस याचिका पर आया जिसमें एक महिला ने विवाह के बाद उत्तराखंड में सरकारी पदों पर SC आरक्षण का लाभ पाने की मांग की थी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
राज्य में सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण का लाभ सिर्फ मूल निवास प्रमाणित उम्मीदवारों तक सीमित रहेगा।
बाहरी राज्यों से आने वाले आवेदकों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा, विशेषकर वे महिलाएं जो विवाह के बाद राज्य में बसती हैं।
निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि उत्तराखंड का आरक्षण केवल राज्य के मूल वंशजों के लिए ही सुरक्षित रहे।
सरकार और सामाजिक वर्गों पर प्रभाव
सामाजिक तौर पर यह फैसला मिश्रित प्रतिक्रियाएं ला सकता है।
आरक्षण नीति में पारदर्शिता और मूल निवासी पहचान बनाए रखने के पक्ष में इसे सकारात्मक कदम माना जाएगा।
हालांकि, कुछ वर्ग इसे विवाह के बाद महिला के अधिकारों के सीमित होने के रूप में भी देख सकते हैं।
आगे क्या?
इस फैसले के बाद सरकार और भर्ती एजेंसियों को आरक्षण नियमों में स्पष्टता लानी पड़ सकती है ताकि भविष्य में विवाद न हो।
वहीं, प्रभावित पक्ष सुप्रीम कोर्ट में अपील भी कर सकते हैं।